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घुटने की चोट या दर्द केवल खिलाड़ियों तक सीमित नहीं है। अब यह हर उम्र के लोगों में आम है। खासकर जब घुटने में दर्द, सूजन या मूवमेंट में दिक्कत लगातार बनी रहती है, तो आर्थोस्कोपी एक सुरक्षित और प्रभावी समाधान है। Arthroscopic Knee Surgery Treatment in Noida में उपलब्ध है। नोएडा के ऑर्थोपेडिक हॉस्पिटल्स अब Arthroscopic Knee Surgery की अत्याधुनिक सुविधा प्रदान कर रहे हैं। जहां कम चीरे, कम दर्द और जल्दी रिकवरी के साथ इलाज संभव है।
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आर्थोस्कोपिक घुटने की सर्जरी (Knee surgery in noida) एक मिनिमली इनवेसिव तकनीक है। जिसमें बड़े चीरे की जगह केवल 2–3 छोटे चीरे लगते हैं। इनसे डॉक्टर एक पतला कैमरा और सूक्ष्म शल्य उपकरण अंदर डालते हैं। कैमरे से घुटने के अंदर का दृश्य मॉनिटर पर देखा जाता है और उसी के आधार पर सर्जरी की जाती है। यह तकनीक एसीएल, पीसीएल, मेनिस्कस, कार्टिलेज या घुटने के अन्य लिगामेंट की चोटों में उपयोग की जाती है।
आर्थोस्कोपिक सर्जरी तब की जाती है जब दवाओं, इंजेक्शन या फिजियोथेरेपी से राहत नहीं मिलती और घुटने की संरचना में वास्तविक क्षति या अस्थिरता होती है। मुख्य स्थितियां जिनमें आर्थोस्कोपिक सर्जरी की जाती है:
एसीएल या पीसीएल लिगामेंट फटना:
घुटने की स्थिरता बनाए रखने वाले मुख्य लिगामेंट्स के फटने पर सर्जरी आवश्यक होती है। खेल गतिविधियों या हादसों में ये चोट आम है। आर्थोस्कोपी द्वारा फटे लिगामेंट का पुनर्निर्माण किया जाता है।
मेनिस्कस का फटना:
मेनिस्कस घुटने के बीच का कुशन होता है जो झटके सोखता है। फटने पर घुटना लॉक होता है। दर्द, सूजन और क्लिकिंग की समस्या होती है। सर्जरी में फटा हिस्सा सिलकर या हटाकर जोड़ को सामान्य किया जाता है।
कार्टिलेज का घिस जाना या टूटना:
जोड़ की हड्डियों के सिरों पर लगी मुलायम परत (कार्टिलेज) के क्षतिग्रस्त होने पर दर्द और रगड़ महसूस होती है। आर्थोस्कोपिक तकनीक से क्षतिग्रस्त हिस्से को समतल या रिपेयर किया जाता है।
जोड़ में ढीलापन या अस्थिरता:
पुराने लिगामेंट या मेनिस्कस चोटों के कारण घुटना कमजोर होता है। आर्थोस्कोपी से टिश्यू को रिपेयर कर स्थिरता बहाल की जाती है।
हड्डी या टिश्यू के टुकड़ों का जोड़ में फंसना:
दुर्घटना या गठिया में हड्डी के छोटे टुकड़े जोड़ के अंदर फंस जाते हैं। इससे मूवमेंट में रुकावट या क्लिक जैसी आवाज आती है। सर्जरी से इन्हें निकालकर जोड़ को मुक्त किया जाता है।
घुटने में लगातार दर्द, सूजन या मूवमेंट की कमी:
लंबे समय से चल रहे आर्थराइटिस (Arthritis), चोट या सूजन में जब अन्य उपचार असफल हों। आर्थोस्कोपी द्वारा जोड़ की सफाई की जाती है जिससे दर्द और सूजन कम होती है।
रोटेशनल या कॉम्प्लेक्स स्पोर्ट्स इंजरी:
फुटबॉल, क्रिकेट, बैडमिंटन या बास्केटबॉल जैसे खेलों में लगी जटिल चोटों के इलाज में भी यह सर्जरी बेहद उपयोगी है।
घुटने में दर्द और सूजन
चलने या मुड़ने पर क्लिकिंग आवाज
घुटने का फिसलना या मुड़ना
मूवमेंट में कठिनाई या जकड़न
खेल या व्यायाम के दौरान अचानक गिरना या घुटना जवाब देना
आर्थोस्कोपिक सर्जरी से पहले सही निदान बेहद जरूरी होता है। जिससे पता चल सके कि जोड़ की समस्या कितनी गंभीर है और किस हिस्से में क्षति हुई है। डॉक्टर विभिन्न क्लिनिकल और इमेजिंग जांचों के माध्यम से सटीक मूल्यांकन करते हैं। मुख्य जांचें जिनसे निदान किया जाता है:
शारीरिक जांच:
डॉक्टर सबसे पहले घुटने की स्थिरता, मूवमेंट और दर्द की तीव्रता को परखते हैं। जोड़ को मोड़ने-सीधा करने, दबाने या खींचने जैसी तकनीकों से यह पता लगाया जाता है कि कौन-सा लिगामेंट, मेनिस्कस या कार्टिलेज प्रभावित है। सूजन, लालिमा, तापमान में वृद्धि या क्लिक जैसी आवाज़ों को भी नोट किया जाता है। इस जांच से प्रारंभिक अंदाजा लगाया जाता है कि समस्या सर्जरी योग्य है या नहीं।
एमआरआई स्कैन:
यह सबसे विश्वसनीय जांच है जिससे लिगामेंट, मेनिस्कस, कार्टिलेज और सॉफ्ट टिश्यू की क्षति का स्पष्ट चित्र मिलता है। एमआरआई से पता चलता है कि चोट आंशिक है या पूर्ण। सूक्ष्म दरारें, सूजन, रक्तस्राव या मांसपेशियों के फटने जैसी स्थितियां भी दिखाई देती हैं। यह डॉक्टर को सर्जरी की आवश्यकता और उसकी योजना तय करने में मदद करता है।
एक्स-रे:
यह जांच हड्डियों के संरेखण, फ्रैक्चर, बोन स्पर, या ऑस्टियोआर्थराइटिस (Osteoarthritis) की स्थिति का पता लगाने के लिए की जाती है। इससे जोड़ों के बीच की दूरी, हड्डियों के घिसाव और जोड़ में कैल्शियम जमाव जैसी समस्याओं का आकलन होता है। एमआरआई से पहले एक्स-रे प्राथमिक स्क्रीनिंग के रूप में किया जाता है ताकि हड्डियों की स्थिति का अंदाजा मिल सके।
अल्ट्रासाउंड:
सॉफ्ट टिश्यू, टेंडन या फ्लूइड की जांच में उपयोगी है। इससे घुटने में तरल पदार्थ जमा है या नहीं, इसका भी पता चलता है।
आर्थोस्कोपी डायग्नोस्टिक टेस्ट:
कुछ मामलों में जब एमआरआई से भी स्पष्ट निदान नहीं मिलता, तो कैमरे की मदद से जोड़ के भीतर देखकर निदान किया जाता है। इसे “डायग्नोस्टिक आर्थोस्कोपी” कहा जाता है, जो छोटी प्रक्रिया होती है और तुरंत सर्जिकल रिपेयर की भी संभावना रहती है।
एनेस्थीसिया देनाः
सर्जरी से पहले मरीज को स्पाइनल या जनरल एनेस्थीसिया दिया जाता है। जिससे उसे कोई दर्द या असुविधा न हो। डॉक्टर मरीज की स्वास्थ्य स्थिति और सर्जरी के प्रकार के अनुसार एनेस्थीसिया का चयन करते हैं। प्रक्रिया के दौरान मरीज पूरी तरह आराम की स्थिति में रहता है।
छोटे चीरे लगानाः
घुटने के आसपास लगभग 2 से 3 छोटे चीरे लगाए जाते हैं। प्रत्येक लगभग 0.5 से 1 सेंटीमीटर के होते हैं। इन चीरे के माध्यम से कैमरा और सर्जिकल उपकरण जोड़ों के भीतर डाले जाते हैं छोटे चीरे होने के कारण घाव जल्दी भर जाते हैं और संक्रमण का खतरा भी बहुत कम रहता है।
कैमरा और उपकरणों का प्रयोगः
एक चीरे से आर्थोस्कोप नामक पतला कैमरा डाला जाता है। जो जोड़ के भीतर की तस्वीर को हाई-डेफिनिशन मॉनिटर पर दिखाता है। दूसरे चीरे से सूक्ष्म सर्जिकल उपकरण जैसे शैवर, कैंची, या ग्रास्पर डाले जाते हैं। इससे डॉक्टर जोड़ की अंदरूनी संरचना को स्पष्ट रूप से देखकर सटीक उपचार करते हैं।
क्षतिग्रस्त टिश्यू की मरम्मत:
कैमरे की मदद से डॉक्टर क्षतिग्रस्त लिगामेंट, मेनिस्कस या कार्टिलेज की पहचान कर उन्हें रिपेयर या हटाते हैं। यदि मेनिस्कस फटा हुआ हो, तो उसे सिलाई (Suturing) के जरिए जोड़ा जाता है। कार्टिलेज डैमेज होने पर खराब हिस्से को हटाकर सतह को स्मूद किया जाता है।
नए लिगामेंट का प्रत्यारोपण:
यदि लिगामेंट पूरी तरह फट चुका है, तो नई ग्राफ्ट लगाई जाती है। जिसे एसीएल या पीसीएल कहा जाता है। यह ग्राफ्ट मरीज के शरीर के किसी अन्य हिस्से (जैसे हैमस्ट्रिंग या पेटेलर टेंडन) से ली जाती है या डोनर से प्राप्त की जाती है। ग्राफ्ट को हड्डी में विशेष स्क्रू या फिक्सेशन डिवाइस से जोड़ा जाता है ताकि यह स्थिर हो सके।
प्रक्रिया की अवधि:
पूरी प्रक्रिया सामान्यतः 60 से 90 मिनट में पूरी हो जाती है।यदि एक से अधिक संरचनाएं रिपेयर की जा रही हों तो समय थोड़ा बढ़ सकता है।
पोस्ट-ऑपरेशन देखभालः
सर्जरी के बाद छोटे चीरे सिल दिए जाते हैं और बैंडेज लगाया जाता है। मरीज को सामान्यतः उसी दिन या अगले दिन डिस्चार्ज कर दिया जाता है। डॉक्टर फिजियोथेरेपी और घुटने को धीरे-धीरे चलाने की सलाह देते हैं ताकि मूवमेंट सामान्य हो सके।
ब्लड टेस्ट, ईसीजी, एक्स-रे और एमआरआई करवाएं।
शुगर, बीपी और वजन नियंत्रित रखें।
डॉक्टर से दवाओं, एलर्जी और पुरानी बीमारियों पर चर्चा करें।
सर्जरी से पहले फिजियोथेरेपी से मांसपेशियों को मजबूत करना लाभदायक होता है।
1–2 दिन अस्पताल में निगरानी में रहना होता है।
दर्द और सूजन के लिए दवा व बर्फ की सिकाई करें।
संक्रमण से बचने के लिए पट्टी को सूखा रखें।
बैसाखी या नी-ब्रेस का प्रयोग डॉक्टर की सलाह से करें।
नियमित फिजियोथेरेपी आवश्यक है। यही रिकवरी की कुंजी है।
आर्थोस्कोपिक सर्जरी पारंपरिक (ओपन) सर्जरी की तुलना में बेहद सुरक्षित, प्रभावी और शीघ्र रिकवरी वाली तकनीक है। यह न केवल दर्द को कम करती है। Arthroscopic Knee Surgery Hospital in Noida में उपलब्ध है। बल्कि मरीज को जल्दी सामान्य जीवन में लौटने का अवसर देती है। मुख्य फायदे इस प्रकार हैं:
आर्थोस्कोपी में घुटने या अन्य जोड़ के आसपास सिर्फ 2–3 छोटे चीरे लगाए जाते हैं, जिनकी लंबाई 1 सेंटीमीटर से भी कम होती है। इससे घाव जल्दी भरता है, दर्द बहुत कम होता है और त्वचा पर स्थायी निशान नहीं के बराबर रहते हैं। पारंपरिक सर्जरी की तरह बड़े टांके या गहरे कट की आवश्यकता नहीं होती।
क्योंकि मांसपेशियों और टिश्यू को ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचता, इसलिए मरीज 3–4 सप्ताह में सामान्य रूप से चल-फिर सकता है। ऑफिस जाने, वाहन चलाने और हल्के व्यायाम जैसी गतिविधियाँ जल्दी शुरू की जा सकती हैं। खिलाड़ियों के लिए यह सर्जरी विशेष रूप से लाभदायक है, क्योंकि वे जल्द ही ट्रेनिंग और खेल में वापसी कर सकते हैं।
छोटे चीरे और आधुनिक उपकरणों की वजह से सर्जरी के दौरान रक्तस्राव बहुत कम होता है। सर्जरी “क्लोज्ड” टेक्निक से होने के कारण संक्रमण का खतरा भी पारंपरिक सर्जरी की तुलना में बेहद कम रहता है। पोस्ट-ऑपरेटिव सूजन और दर्द भी बहुत सीमित होते हैं।
अधिकतर मामलों में मरीज को उसी दिन या अगले दिन डिस्चार्ज कर दिया जाता है। लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती रहने की आवश्यकता नहीं पड़ती, जिससे आर्थिक और मानसिक दोनों तरह का बोझ कम होता है। यह प्रक्रिया डे-केयर सर्जरी के रूप में भी की जाती है।
सर्जरी के कुछ ही दिनों बाद मरीज सामान्य हलचल करने लगता है और धीरे-धीरे पूरी मूवमेंट हासिल कर लेता है। नियमित फिजियोथेरेपी और डॉक्टर की सलाह से चलने-फिरने की क्षमता पूरी तरह लौट आती है। यह तकनीक खासतौर पर खिलाड़ियों, युवा मरीजों और व्यस्त पेशेवरों के लिए अत्यंत उपयोगी है।
किसी भी सर्जरी की तरह इसमें कुछ हल्के और दुर्लभ जोखिम भी होते हैं। अनुभवी सर्जन और उचित पोस्ट-ऑपरेटिव देखभाल से इनका खतरा लगभग नगण्य रहता है।
संभावित जोखिमः
सर्जरी के बाद कुछ मरीजों में घुटने के आसपास हल्की सूजन, लाली या दर्द महसूस होता है। यह आमतौर पर अस्थायी होता है। एंटीबायोटिक दवाओं या बर्फ की सिकाई से ठीक होता है। उचित सफाई और ड्रेसिंग से संक्रमण का खतरा लगभग समाप्त किया जाता है।
अस्थायी अकड़न या जकड़न:
सर्जरी के कुछ दिनों बाद घुटने या जोड़ में हल्की अकड़न या मूवमेंट में कमी महसूस होती है। यह आम तौर पर फिजियोथेरेपी और नियमित व्यायाम से ठीक होती है। यदि समय पर मूवमेंट शुरू कर दिया जाए तो यह समस्या बहुत जल्दी समाप्त हो जाती है।
रक्त का थक्का बनना:
बहुत ही दुर्लभ मामलों में डीप वेन थ्रोम्बोसिस (Deep vein thrombosis) यानी रक्त का थक्का बन सकता है, जो पैरों में दर्द या सूजन का कारण बनता है। डॉक्टर इसके लिए ब्लड थिनर दवाइयां या लेग मूवमेंट एक्सरसाइज़ की सलाह देते हैं। पर्याप्त पानी पीना और जल्दी चलना-फिरना इस खतरे को और कम करता है।
आर्थोस्कोपिक घुटने की सर्जरी एक आधुनिक, सुरक्षित और प्रभावी तकनीक है। जो पुराने समय की ओपन सर्जरी की तुलना में तेज़ रिकवरी और बेहतर परिणाम देती है। नोएडा में अत्याधुनिक तकनीक और अनुभवी ऑर्थोपेडिक विशेषज्ञों (orthopedic specialists in Noida) के साथ यह प्रक्रिया अब अधिक सुलभ और सफल है। इसलिए इलाज में देरी नहीं करनी चाहिए। इलाज में देरी से नुकसान होता है।
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प्रश्न 1. क्या आर्थोस्कोपिक सर्जरी दर्दनाक होती है?
उत्तर: नहीं, यह मिनिमली इनवेसिव प्रक्रिया है। दर्द बहुत कम होता है। दवाओं से नियंत्रित किया जाता है।
प्रश्न 2. सर्जरी के बाद कितने दिन में चल सकते हैं?
उत्तर: ज्यादातर मरीज 2–3 दिन में सहारे से और 2–3 हफ्तों में बिना सहारे चल सकते हैं। लेकिन डॉक्टर की सलाह जरूरी है।
प्रश्न 3. क्या यह सर्जरी हर उम्र में सुरक्षित है ?
उत्तर: हां, यदि मरीज का स्वास्थ्य सामान्य है तो यह 18 से 70 वर्ष तक के लोगों के लिए सुरक्षित है।
प्रश्न 4. क्या सर्जरी के बाद फिर से खेलों में लौटना संभव है ?
उत्तर: हां, 3–6 महीने की फिजियोथेरेपी के बाद डॉक्टर की सलाह अनुसार खेलों में वापसी की जाती है।
प्रश्न 5. क्या यह सर्जरी स्थायी समाधान है?
उत्तर: हां, सही तकनीक और फॉलोअप के साथ यह दीर्घकालिक राहत देती है। इसलिए बीमारी के गंभीर होने से पहले ही डॉक्टर की सलाह पर इलाज कराना चाहिए।