Subscribe to our
वल्वर कैंसर महिलाओं में होने वाला एक दुर्लभ लेकिन गंभीर कैंसर है, जो महिलाओं के जननांग के बाहरी हिस्से (वल्वा) को प्रभावित करता है। समय पर पहचान और इलाज से हम जीवन की गुणवत्ता को बनाए रख सकते है। अगर आपको भी अपने या अपने प्रियजन के अंदर कुछ बदलाव या लक्षण दिख रहे हैं तो समय रहते ग्रेटर नोएडा में सर्वश्रेष्ठ स्त्री रोग अस्पताल (Best Gynecology Hospitals in Greater Noida) से सलाह प्राप्त कर सकते है। इस ब्लॉग पोस्ट में हम जानेंगे कि वल्वर कैंसर क्या होता है?, इसके लक्षण, कारण, जांच और इलाज गाइनोकोलॉजिकल गाइडलाइन्स के अनुसार कैसे किए जाते हैं।
ज्यादा जानकारी के लिए हमें कॉल करें +91 9667064100.
वल्वर कैंसर (Vulvar cancer) महिलाओं के बाहरी जननांगों यानी वल्वा में विकसित एक दुर्लभ कैंसर है। यह कैंसर वल्वा की त्वचा या इसके नीचे की कोशिकाओं में असामान्य रूप से बढ़ता है। जिससे ट्यूमर होता है। यह कैंसर धीरे-धीरे होता है। अगर समय रहते पहचान न हो तो यह आसपास के अंगों में भी फैल जाता है।
वल्वा महिलाओं की प्रजनन प्रणाली का बाहरी हिस्सा है। जिसमें लैबिया माजोरा (बाहरी होंठ), लैबिया मिनोरा (भीतरी होंठ), क्लिटोरिस, वेस्तिब्यूल (योनि का प्रवेश द्वार), यूरिन मार्ग का द्वार (यूरेथ्रा ओपनिंग) ये मुख्य अंग शामिल होते हैं। वल्वा महिला के जननांगों की पहली सुरक्षा परत होती है। यह यौन स्वास्थ्य व यूरिन संबंधी कार्यों में मुख्य भूमिका निभाती है। यह कैंसर अक्सर वृद्ध महिलाओं में दिखता है। मगर कुछ मामलों में यह कम उम्र की महिलाओं को भी प्रभावित करता है। खासकर अगर एचपीवी (एचपीवी) संक्रमण मौजूद हो।
यह सबसे सामान्य प्रकार है लगभग 70%–90% मामलों में होता है। यह वल्वा की बाहरी त्वचा की परत की कोशिकाओं में होता है।
यह त्वचा के रंग बनाने वाली कोशिकाओं (मेलानोसाइट्स) से शुरू होता है। यह तेजी से फैलता है। अक्सर गहरे रंग के धब्बे या गांठ के रूप में प्रकट होता है।
यह बहुत धीरे बढ़ने वाला कैंसर है। वल्वा पर यह बहुत कम दिखता है। लेकिन स्किन कैंसर (skin cancer) के रूप में मौजूद होता है।
यह ग्रंथि कोशिकाओं से उत्पन्न होता है और दुर्लभ प्रकार में गिना जाता है। यह तब होता है जब ग्रंथियों की कोशिकाएं असामान्य रूप से बढ़ती हैं।
यह वल्वा के गहरे टिशू से उत्पन्न होता है और अत्यंत दुर्लभ होता है। यह सामान्यतः सॉफ्ट टिशू सारकोमा की श्रेणी में आता है।
वल्वर कैंसर का कोई एक निश्चित कारण नहीं होता, लेकिन कुछ मुख्य जोखिम कारक और संभावित कारण निम्न हैं:
ह्यूमन पैपिलोमावायरस (एचपीवी) एक आम यौन संचारित वायरस है। जो वल्वर कैंसर में पाया जाता है। विशेषकर एचपीवी-16 और एचपीवी-18 प्रकार कैंसरकारी होते हैं। जो लंबे समय तक एचपीवी संक्रमण रहने पर वल्वा की कोशिकाओं में कैंसरजनक बदलाव होता हैं।
वल्वर कैंसर वृद्ध महिलाओं में अधिक देखा जाता है। 60 वर्ष से अधिक आयु की महिलाओं में इसका जोखिम अधिक होता है। उम्र के साथ कोशिकाओं की मरम्मत की क्षमता कम होती है।
जिन महिलाओं की इम्यून सिस्टम कमजोर होता है। यानी एचआईवी/एड्स (HIV/AIDS) या ऑर्गन ट्रांसप्लांट लेने वाली महिलाओं में कैंसर से लड़ने की क्षमता घटती है। एचपीवी जैसे वायरस भी ऐसे शरीर में सक्रिय रहते हैं।
धूम्रपान करने वाली महिलाओं में एचपीवी संक्रमण के कैंसर में बदलने का खतरा अधिक होता है। निकोटिन व अन्य टॉक्सिन्स से शरीर की कोशिकाओं को नुकसान होता है।
प्री-कैंसर की इस स्थिति में वल्वा की कोशिकाएं असामान्य होती है। समय रहते वीआईएन का इलाज न होने यह वल्वर कैंसर में बदलता है। यह स्थिति विशेष रूप से एचपीवी पॉजिटिव महिलाओं में दिखती है।
यह एक दीर्घकालिक त्वचा रोग है, जो वल्वा की त्वचा को पतला, सफेद और खुजलीदार बनाता है। समय के साथ यह त्वचा कैंसर (skin cancer) की संभावना को बढ़ाता है। खासकर बुजुर्ग महिलाओं में होता है।
शुरुआती लक्षणों को अगर समय पर पहचान जाए तो इलाज संभव है। अक्सर महिलाएं इन लक्षणों को नजरअंदाज करती हैं, जो बाद में गंभीर रूप लेती है।
खुजली या जलनः
वल्वा में बार-बार या लंबे समय तक होने वाली खुजली एक प्रमुख संकेत है। यह साधारण इन्फेक्शन होता है। जब यह लगातार हो तो सावधानी जरूरी है।
दर्दः
पेशाब करते समय व चलने के दौरान दर्द महसूस होता है। यह दर्द कभी हल्का और कभी तेज होता है।
रक्तस्रावः
रजोनिवृत्ति के बाद प्राइवेट पार्ट से खून आना चिंताजनक संकेत है साथ ही इसमें बिना कारण के डिस्चार्ज या दाग-धब्बे भी दिखते हैं।
वल्वा में गांठ:
वल्वा की सतह पर कोई कठोर गांठ, मस्सा या न भरने वाला छाला दिखाई दे तो तुरंत जांच करानी चाहिए, ये घाव दर्दरहित भी होते हैं।
त्वचा में रंग का परिवर्तनः
वल्वा की त्वचा का रंग सफेद, गहरा या धब्बेदार हो जाता है। त्वचा मोटी, खुरदरी या पपड़ी जैसी होना भी कैंसर का संकेत है।
शुरुआती लक्षण बहुत हल्के होते हैं। इन्हें नजरअंदाज करना खतरा बढ़ाता है। 60 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं और एचपीवी संक्रमित महिलाओं को सतर्कता बरतनी चाहिए, जिसके लिए उन्हें समय पर स्त्री रोग विशेषज्ञ से सलाह लेना आवश्यक है।
वल्वर कैंसर की पहचान और इलाज के लिए शुरुआती जांच जरूरी है।
शारीरिक जांचः
डॉक्टर मरीज के वल्वा क्षेत्र की जांच करते हैं और त्वचा की बनावट, रंग, गांठ, सूजन, घाव देखते हैं साथ ही लिंफ नोड्स में सूजन की जांच करते हैं, जिससे कैंसर के फैलाव का संकेत पता चलता है।
बायोप्सी:
बायोप्सी वल्वर कैंसर की जांच के लिए महत्वपूर्ण टेस्ट है। इसमें वल्वा के संदिग्ध भाग से छोटा सैंपल निकालकर प्रयोगशाला में जांच को भेजा जाता है, जिससे कैंसर के प्रकार और ग्रेड को समझने में मदद मिलती है।
कोलपोस्कोपीः
इस माइक्रोस्कोपिक जांच में वल्वा की कोशिकाओं को जूम कर देखते हैं। कोलपोस्कोपी बायोप्सी से पहले होने वाली सहायक जांच है।
इमेजिंग टेस्टः
अगर बायोप्सी में कैंसर की पुष्टि हो जाती तो यह जानना जरूरी होता है कि कैंसर कहां तक फैला है इसके लिए यह टेस्ट जरूरी होते हैं। एमआरआई में वल्वा और आसपास के ऊतकों की स्पष्ट तस्वीर मिलती है। सीटी स्कैन में शरीर में कैंसर के फैलाव, विशेषकर लिंफ नोड्स और पेट के अंगों में जानकारी देता है। पेट स्कैन में सक्रिय कैंसर कोशिकाओं का पता चलता है।
वल्वर कैंसर को उसके फैलाव और गंभीरता के आधार पर चार चरणों में वर्गीकृत किया जाता है।
स्टेज 1 में कैंसर केवल वल्वा तक सीमित रहता है। ट्यूमर का आकार दो सेंटीमीटर से छोटा होता है।
स्टेज 2 में कैंसर वल्वा से बाहर की त्वचा या ऊतकों में फैलता है। यह लिम्फ नोड्स तक नहीं पहुंचता।
स्टेज 3 में कैंसर जांघ के पास स्थित लिम्फ नोड्स में फैल जाता है।
स्टेज 4 में कैंसर यूरेटरी, मलाशय या शरीर के अन्य दूरस्थ अंगों जैसे फेफड़ों तक फैलता है।
इलाज का चयन ट्यूमर के आकार, स्थान, स्टेज और मरीज की शारीरिक स्थिति के आधार पर किया जाता है।
सर्जरीः
वल्वर कैंसर के इलाज के तरीकों में सर्जरी पहली और सबसे महत्वपूर्ण लाइन ऑफ ट्रीटमेंट होती है, इसमें ट्यूमर और उसके आसपास की स्वस्थ ऊतक को सुरक्षित अंतर के साथ हटाया जाता है। वल्वेक्टोमी में कैंसरग्रस्त भाग हटाया जाता है वहीं पूर्ण वल्वेक्टोमी में जब कैंसर फैला हो, तब पूरी वल्वा हटानी पड़ती है। लिम्फैडेनेक्टॉमी में लिम्फ नोड्स में कैंसर फैलने की संभावना हो तो यह जांच और उपचार आवश्यक होता है।
रेडियोथेरेपीः
रेडियोथेरेपी में उच्च ऊर्जा वाली किरणों से कैंसर कोशिकाओं को नष्ट किया जाता है। जब ट्यूमर पूरी तरह हटाना संभव न हो या ऑपरेशन के बाद बचे हुए कोशिकाओं को खत्म करने के लिए होता है। अगर लिम्फ नोड्स में कैंसर फैल गया हो तो रेडियोथेरेपी जरूरी होती है। रेडियोथेरेपी सर्जरी से पहले या बाद में दी जा सकती है।
कीमोथेरेपीः
कीमोथेरेपी में कैंसर कोशिकाओं को मारने के लिए दवाओं का इस्तेमाल किया जाता है। खासतौर से जब कैंसर एडवांस स्टेज में हो या पुनरावृत्ति की संभावना हो। इसमें कई बार रेडियोथेरेपी (Radiotherapy) के साथ कीमोथेरेपी को एक साथ दिया जाता है। इससे रेडिएशन का प्रभाव और अधिक बढ़ता है। कीमोथेरेपी के दुष्प्रभावों में बाल झड़ना, कमजोरी, मतली हो सकते हैं।
इम्यूनोथेरेपीः
नई रिसर्च आधारित इलाज जो उन्नत या मेटास्टेटिक वल्वर कैंसर के लिए उपयोगी हो सकते हैं। यह इलाज अभी क्लिनिकल ट्रायल या सीमित उपयोग में हैं, खासकर जब पारंपरिक इलाज बेअसर हो।
वल्वर कैंसर के इलाज की योजना मुख्य रूप से इस पर निर्भर करती है कि कैंसर किस चरण में है।
स्टेज 1: लो-रिस्क ट्यूमर और ट्रीटमेंटः
ट्यूमर छोटा होता है और वल्वा तक ही सीमित रहता है, लिम्फ नोड्स में फैलाव नहीं होता। यदि ट्यूमर की गहराई कम हो और किनारों में कैंसर न हो तो कोई अन्य उपचार आवश्यक नहीं। सेंटिनल लिम्फ नोड बायोप्सी किया जा सकता है यदि ट्यूमर 1 mm से गहरा हो।
स्टेज 2: सर्जरी के साथ या बिना रेडियोथेरेपीः
ट्यूमर वल्वा से आगे आसपास के ऊतकों (जैसे यूरीथ्रा, वेजाइना, एनस) में फैल चुका होता है, लेकिन लिम्फ नोड्स में नहीं गया होता। यदि ट्यूमर का साइज बड़ा है या मार्जिन क्लीन न हों तो रेडियोथेरेपी दी जाती है, इसमें लिम्फ नोड एसेसमेंट जरूरी है।
स्टेज 3-4: मल्टीमॉडल थेरेपीः
इसमें कैंसर लिम्फ नोड्स तक फैल चुका होता है। यह यूरीनरी ब्लैडर, मलाशय, या शरीर के दूरस्थ अंगों तक फैलता है।
अगर कैंसर वापस लौट आए या स्टेज 4 बी में स्थानीकृत हो और अन्य इलाज विफल हो जाए। पेल्विक एक्सेंटेरेशन एक बड़ी सर्जरी होती है। जिसमें वल्वा के साथ साथ मूत्राशय, यूटेरस, वेजाइना और/या मलाशय को भी हटाया जा सकता है। यह प्रक्रिया तब अपनाई जाती है जब रोगी शारीरिक रूप से सक्षम हो और कैंसर सिर्फ पेल्विक क्षेत्र तक सीमित हो।
वल्वर कैंसर का इलाज समाप्त होने के बाद भी ध्यान देना जरूरी होता है, क्योंकि यह रोग शरीर के साथ-साथ मानसिक और भावनात्मक स्तर पर भी गहरा असर डाल सकता है।
वल्वा की सर्जरी या रेडियोथेरेपी के बाद त्वचा में कठोरता, सूखापन या जलन हो सकती है। महिला की सेल्फ इमेज, आत्मविश्वास और यौन पहचान प्रभावित हो सकती है। निराशा, चिंता, डिप्रेशन जैसी समस्याएं आ सकती हैं। गाइनोकोलॉजिकल ऑन्कोलॉजी सोसाइटीज द्वारा निर्धारित समयबद्ध फॉलोअप बहुत जरूरी होता है। वल्वर कैंसर में पहले 2–3 वर्षों में रिकारेंस की संभावना अधिक रहती है।
गाइनेकोलॉजिकल ऑन्कोलॉजिस्ट मुख्य विशेषज्ञ जो स्त्री जननांग अंगों (जैसे वल्वा, गर्भाशय, अंडाशय) के कैंसर के निदान और इलाज में प्रशिक्षित होते हैं। यह सर्जरी, कीमोथेरेपी और इलाज की योजना यही डॉक्टर बनाते हैं। अगर गाइनेकोलॉजिकल ऑन्कोलॉजिस्ट उपलब्ध नहीं हो, तो यह विशेषज्ञ कैंसरग्रस्त ऊतक को शल्य क्रिया द्वारा निकालते हैं।
वल्वर कैंसर समय रहते निदान हो तो इलाज आसाना होता है। क्योंकि इससे शरीर का संवेदनशील हिस्से प्रभावित होता है। इसलिए शारीरिक, भावनात्मक समर्थन जरूरी होता है। गाइडलाइन आधारित उपचार से जीवन की गुणवत्ता में सुधार होता है। एचपीवी वैक्सीनेशन, धूम्रपान छोड़ना और वीआईएन जैसी प्री-कैंसर अवस्थाओं की निगरानी से इसे रोका जा सकता है। महिला को वल्वा संकोच नहीं, सजगता रखनी चाहिए। समय पर जांच, सही उपचार और जागरूकता वल्वर कैंसर से लड़ने का सबसे कारगर रास्ता होता है।
उत्तर: इलाज की अवधि ट्यूमर की stage, प्रकार और चुनी गई थेरेपी (जैसे सर्जरी, रेडियोथेरेपी, कीमोथेरेपी) पर निर्भर करती है।
उत्तर: शुरुआती स्टेज में इलाज का success rate बहुत अधिक होता है। स्टेज 1 में इलाज के बाद 5 साल की जीवन प्रत्याशा 85–90 प्रतिशत तक हो सकती है।
उत्तर: अगर लिम्फ नोड्स में कैंसर फैला था या बाद में वीआईएन/एचपीवी संक्रमण बना रहता है तो नियमित follow-up जरूरी होता है। खासकर पहले 2–3 वर्षों में जांच जरूरी है।
उत्तर: वल्वर कैंसर स्वयं संक्रामक नहीं होता। इसका एक प्रमुख कारण एचपीवी संक्रमण है, जो यौन संपर्क से फैल सकता है। एचपीवी से बचाव के लिए vaccination जरूरी है।
उत्तर: यह आमतौर पर 60 वर्ष से ऊपर की महिलाओं में अधिक पाया जाता है, लेकिन एचपीवी संक्रमण के कारण अब युवा महिलाओं में भी risk बढ़ रहा है।