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फेफड़े हमारे शरीर की ऑक्सीजन प्रणाली का सबसे अहम हिस्सा हैं। लेकिन जब फेफड़ों के ऊतक में लगातार सूजन या फाइब्रोसिस होता है। तो सांस लेना मुश्किल होता है। इस स्थिति को इंटरस्टीशियल लंग डिजीज (Interstitial Lung Disease- ILD) कहते हैं। यह कोई एक बीमारी नहीं, बल्कि फेफड़ों को प्रभावित करने वाले कई रोगों का समूह है। नोएडा में पल्मोनोलॉजिस्ट डॉक्टर उपलब्ध है। इसकी पहचान और आधुनिक इलाज में दक्ष हैं। शुरुआती लक्षणों की पहचान और समय पर उपचार से रोग को नियंत्रित किया जाता है।
इंटरस्टीशियल लंग डिजीज (आईएलडी) उन बीमारियों का समूह है जो फेफड़ों के इंटरस्टीशियम यानी फेफड़ों की सूक्ष्म दीवारों और ऊतकों को प्रभावित करती हैं। इसमें सूजन या स्कारिंग होती है। जिससे फेफड़े कठोर होते हैं। ऑक्सीजन का आदान-प्रदान प्रभावित होता है। नतीजा सांस फूलना, थकान, और धीरे-धीरे शरीर में ऑक्सीजन की कमी होती है।
ऑटोइम्यून बीमारियां:
रूमेटॉइड आर्थराइटिस, ल्यूपस, या स्क्लेरोडर्मा जैसी बीमारियों में शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली फेफड़ों के ऊतकों पर हमला करती है।
प्रदूषण और धूल के कण:
खनिज धूल (जैसे सिलिका, एस्बेस्टस), धुआं, रासायनिक गैसें या पक्षियों की बीट के लगातार संपर्क से आईएलडी होता है।
दवाओं के साइड इफेक्ट:
कुछ एंटीबायोटिक्स, कीमोथेरेपी, या हार्ट की दवाएं फेफड़ों में फाइब्रोसिस पैदा करती हैं।
संक्रमणः
कुछ वायरल, फंगल या बैक्टीरियल संक्रमण लंबे समय तक रहने पर फेफड़ों में स्थायी सूजन करते हैं।
आनुवांशिक कारणः
कई बार परिवार में पहले से आईएलडी के मामले रहे हों तो जोखिम बढ़ता है।
धूम्रपान:
स्मोकिंग आईएलडी की प्रगति को तेज करता है और फेफड़ों के फाइब्रोसिस को स्थायी बनाता है।
सांस फूलना (विशेषकर चलते समय या सीढ़ी चढ़ते समय)
लगातार सूखी खांसी
थकान या कमजोरी
सीने में जकड़न या दर्द
वजन घटना और भूख कम होना
उंगलियों के सिरे चौड़े होना
नींद के दौरान ऑक्सीजन लेवल गिरना

इंटरस्टीशियल लंग डिजीज (आईएलडी) कई तरह की स्थितियों का समूह है। जिसमें फेफड़ों के ऊतक में सूजन और फाइब्रोसिस होता है। नीचे प्रमुख प्रकार और उनके कारण बताए गए हैं—
इस बीमारी का कोई निश्चित कारण नहीं होता, इसलिए इसे इडियोपैथिक कहा जाता है। फेफड़ों में धीरे-धीरे स्कार टिश्यू बनता है। जिससे उनकी लोच कम होती है। मरीज को धीरे-धीरे बढ़ती सांस की तकलीफ और सूखी खांसी की शिकायत रहती है। यह बीमारी मध्य और वृद्ध आयु वर्ग के लोगों में अधिक पाई जाती है। सीटी स्कैन में हनीकॉम्ब पैटर्न आपीएफ की पहचान होती है।
यह आईएलडी का प्रकार धूल, फंगस, पक्षियों के पंख, या अन्य जैविक कणों के प्रति एलर्जिक प्रतिक्रिया से होता है। इसे किसान का फेफड़ा" या "पक्षी पालने वाले का फेफड़ा" भी कहा जाता है। एलर्जन के लगातार संपर्क से फेफड़ों में सूजन और फाइब्रोसिस विकसित होता है।
यह एक इम्यून सिस्टम से जुड़ी बीमारी है जिसमें शरीर के कई अंगों (फेफड़े, लसीका ग्रंथि, त्वचा, आंखें) में ग्रेन्युलोमा (सूजनयुक्त टिश्यू) बनते हैं। फेफड़ों में ग्रेन्युलोमा बनने से सांस लेने में कठिनाई, सूखी खांसी और सीने में दर्द होता है। एक्स-रे या सीटी स्कैन में “हिलर लिम्फ नोड्स” का बढ़ना इसका संकेत होता है। इलाज में कॉर्टिकोस्टेरॉइड्स प्रमुख रूप से उपयोग किए जाते हैं। गंभीर मामलों में इम्यूनो-मॉड्युलेटरी दवाएं दी जाती हैं।
यह प्रकार उन मरीजों में होता है जो पहले से स्वप्रतिरक्षी रोग से ग्रस्त होते हैं। जैसे रूमेटॉइड आर्थराइटिस, सिस्टमिक ल्यूपस एरिथेमेटोसस, स्क्लेरोडर्मा या मिक्स्ड कनेक्टिव टिश्यू डिजीज, इन बीमारियों में शरीर की रक्षा प्रणाली गलती से अपने ही फेफड़ों के ऊतक पर हमला करती है। परिणामस्वरूप फेफड़ों में सूजन और फाइब्रोसिस विकसित होता है। इलाज में इम्यूनो-सप्रेसिव थैरेपी जैसे माइकोफेनोलेट, साइक्लोफॉस्फेमाइड) और कॉर्टिकोस्टेरॉइड्स का उपयोग किया जाता है।
कुछ दवाएं लंबे समय तक लेने से फेफड़ों के ऊतकों को नुकसान पहुंचाती हैं। इलाज में सबसे पहले संभावित दवा को बंद किया जाता है, और स्टेरॉयड या ऑक्सीजन थेरेपी से राहत दी जाती है।
इंटरस्टीशियल लंग डिजीज (आईएलडी) का उपचार रोग की गंभीरता, कारण और मरीज की स्थिति पर निर्भर करता है। नोएडा में इंटरस्टीशियल लंग डिजीज का इलाज उपलब्ध है। इसका उद्देश्य फेफड़ों में सूजन को कम करना, स्कारिंग की प्रगति को रोकना और मरीज की सांस लेने की क्षमता में सुधार लाना होता है।
माइकोफेनोलेट, साइक्लोफॉस्फेमाइड) दवा-प्रेरित आईएलडी यह दवाएं फेफड़ों में सूजन को कम करती हैं। शुरुआती चरणों में दी जाने पर फेफड़ों की कार्यक्षमता (Lung Function) में सुधार देखा जाता है। ऑटोइम्यून या हाइपरसेंसिटिविटी से जुड़े आईएलडी मामलों में सबसे ज्यादा लाभदायक है।लंबे समय तक उपयोग के दौरान शुगर, वजन बढ़ना या हड्डियों की कमजोरी जैसे दुष्प्रभावों पर नज़र रखनी चाहिए। कॉर्टिकोस्टेरॉइड्स (जैसे प्रेडनिसोलोन, मिथाइलप्रेडनिसोलोन) यह दवाएं फाइब्रोसिस की गति को धीमा करती हैं। विशेष रूप से इडियोपैथिक पल्मोनरी फाइब्रोसिस (आईपीएफ)के मरीजों में अत्यधिक प्रभावी होती है। पिरफेनिडोनफेफड़ों में सूजन पैदा करने वाले रसायनों को रोकता है। जबकि Nintedanib विकास कारकों ( को नियंत्रित करके टिश्यू स्कारिंग को कम करता है।
नियमित एलएफटी (लिवर फंक्शन टेस्ट) कराना आवश्यक होता है क्योंकि ये दवाएं लीवर पर असर डाल सकती हैं। ये दवाएं ऑटोइम्यून बीमारियों (जैसे रूमेटॉइड आर्थराइटिस, ल्यूपस) से उत्पन्न आईएलडी में दी जाती हैं। यह शरीर की इम्यून प्रतिक्रिया को नियंत्रित करके सूजन और फेफड़ों की क्षति को कम करती हैं। इनका प्रयोग विशेषज्ञ की निगरानी में ही किया जाना चाहिए, क्योंकि इससे संक्रमण का जोखिम बढ़ता है।
जब मरीज के रक्त में ऑक्सीजन स्तर (SpO₂) लगातार 90% से नीचे चला जाए, तो ऑक्सीजन सपोर्ट जरूरी हो जाता है। इससे फेफड़ों पर दबाव कम होता है और शरीर के अंगों तक पर्याप्त ऑक्सीजन पहुंचती है। घरेलू ऑक्सीजन कंसंट्रेटर हल्के या मध्यम मामलों के लिए उपयोगी होती है। अस्पताल में ऑक्सीजन सपोर्ट या वेंटिलेटर: गंभीर और एडवांस्ड फेफड़ों की क्षति में आवश्यक है। ऑक्सीजन थेरेपी के साथ मरीज को नियमित एसपीओ₂ मॉनिटरिंग और पल्मोनरी फॉलो-अप कराना चाहिए।
नोएडा के कई मल्टी-स्पेशलिटी हॉस्पिटल्स में विशेष फुफ्फुसीय पुनर्वास कार्यक्रम उपलब्ध हैं। जिनमें फिजियोथेरेपी बलगम को ढीला करने और फेफड़ों को सक्रिय रखने में मदद करती है। सांस लेने की एक्सरसाइज जैसे पर्स्ड लिप ब्रीदिंग, डायाफ्रामिक ब्रीदिंग जो फेफड़ों की क्षमता बढ़ाते हैं। पोस्ट्योरल ड्रेनेज में शरीर की स्थिति बदलकर फेफड़ों से म्यूकस निकालने की तकनीक होती है। पोषण गाइडेंस में हाई-प्रोटीन, विटामिन-डी, ओमेगा-3 और एंटीऑक्सीडेंट युक्त आहार से रिकवरी में मदद मिलती है। साइकोलॉजिकल काउंसलिंग लंबे इलाज के दौरान मरीजों में चिंता या अवसाद से राहत के लिए होती है।
स्वस्थ जीवनशैली आईएलडी के प्रबंधन में बेहद अहम भूमिका निभाती है।
धूम्रपान पूरी तरह छोड़ें: सिगरेट या बीड़ी का धुआं फेफड़ों की क्षति को कई गुना बढ़ाता है।
प्रदूषण और धूल से बचाव: बाहर जाते समय एन 95 मास्क पहनें, घर में एयर प्यूरिफायर का प्रयोग करें।
हल्का व्यायाम करें: योग, वॉकिंग और प्राणायाम से फेफड़ों की क्षमता बढ़ती है।
संतुलित आहार लें: एंटीऑक्सीडेंट्स (जैसे फल, सब्जियां, ग्रीन टी) और विटामिन सी, डी का सेवन करें।
नियमित जांच: एसपीओटू, पीएफटी और एचआरटीसी की नियमित मॉनिटरिंग करवाते रहें।
वैक्सीन लगवाएं: फ्लू और न्यूमोकोकल वैक्सीन से संक्रमण का खतरा कम होता है।
जब दवाओं और थेरेपी से स्थिति में सुधार न हो तो फेफड़ों का प्रत्यारोपण अंतिम विकल्प होता है। यह आमतौर पर एंड-स्टेज पल्मोनरी फाइब्रोसिस या आईपीएफ के मरीजों में किया जाता है। इससे जीवन प्रत्याशा और जीवन की गुणवत्ता (दोनों में सुधार देखा जाता है। नोएडा और दिल्ली-एनसीआर (Delhi-NCR) के कुछ एडवांस हॉस्पिटल्स में ट्रांसप्लांट मूल्यांकन और प्री-सर्जिकल केयर की सुविधाएं उपलब्ध हैं। ट्रांसप्लांट के बाद मरीज को इम्यूनोसप्रेसिव दवाएं और सख्त मेडिकल मॉनिटरिंग की आवश्यकता होती है।
धूम्रपान से पूर्ण परहेज करें।
प्रदूषण या धूल वाले वातावरण में मास्क पहनें।
संक्रमण से बचाव के लिए फ्लू और न्यूमोकोकल वैक्सीन लगवाएं।
पौष्टिक आहार लें, जिसमें एंटीऑक्सीडेंट्स और विटामिन डी भरपूर हों।
नियमित फेफड़ों की जांच करवाते रहें।
इंटरस्टीशियल लंग डिजीज (आईएलडी) एक गंभीर लेकिन प्रबंधनीय रोग है। यदि समय रहते फुफ्फुसीय रोग विशेषज्ञ से सलाह ली जाए, तो मरीज की जीवन गुणवत्ता को काफी हद तक बेहतर किया जाता है। सांस फूलना, सूखी खांसी या थकान जैसे लक्षणों को अनदेखा न करें। समय पर जांच ही सबसे बड़ा इलाज है। इलाज में देरी से नुकसान होता है।
प्रश्न 1: क्या इंटरस्टीशियल लंग डिजीज पूरी तरह ठीक होती है?
उत्तर: पूरी तरह नहीं, लेकिन दवाओं और थेरेपी से इसके बढ़ने की गति को रोका जाता है।
प्रश्न 2: आईएलडी और अस्थमा में क्या अंतर है?
उत्तर: अस्थमा में वायुमार्ग संकुचित होते हैं, जबकि आईएलडी में फेफड़ों के ऊतक कठोर होते हैं।
प्रश्न 3: क्या आईएलडी केवल बुजुर्गों में होता है?
उत्तर: नहीं, यह किसी भी उम्र में होता है। विशेषकर उन लोगों में जो धूल या रासायनिक धुएं के संपर्क में रहते हैं।
प्रश्न 4: क्या आईएलडी के लिए ऑक्सीजन थेरेपी जीवनभर लेनी पड़ती है?
उत्तर: यह रोग की गंभीरता पर निर्भर करता है। कुछ मरीजों को केवल एक्टिविटी के समय जरूरत पड़ती है।
प्रश्न 5: नोएडा में आईएलडी के इलाज के लिए कौन से अस्पताल प्रसिद्ध हैं?
उत्तर: फेलिक्स हॉस्पिटल, फोर्टिस हॉस्पिटल, जेपी हॉस्पिटल, कैलाश हॉस्पिटल, और यथार्थ सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल उपलब्ध है।