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हिप रिप्लेसमेंट सर्जरी सिर्फ बुजुर्गों के लिए नहीं, बल्कि ऐसे कई मरीजों के लिए भी उम्मीद की किरण बनती है। यह ऑस्टियोआर्थराइटिस, रुमेटाइड आर्थराइटिस, चोट या जन्मजात कारणों से होता है। इस कारण असहनीय दर्द और चलने-फिरने की तकलीफ होती है। मगर समय पर सर्जरी से व्यक्ति का जीवन फिर से सक्रिय हो सकता है। आइये इस सर्जरी की लागत, रिकवरी और जरूरी सावधानियों के बारे में जानते हैं।
अगर आप इन समस्याओं का सही और सुरक्षित इलाज ढूंढ रहे हैं, तो ग्रेटर नोएडा में सर्वश्रेष्ठ आर्थोपेडिक अस्पताल का चुनाव करना बेहद जरूरी है। जहां विशेषज्ञ डॉक्टरों की देखरेख में आधुनिक जांच और इलाज की सुविधा उपलब्ध हो।
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हिप रिप्लेसमेंट सर्जरी क्या है? (What is Hip Replacement Surgery?)
सर्जरी का प्रोसेस संक्षेप में (The Surgical Process in Brief)
जरूरी सावधानियां और लाइफस्टाइल एडजस्टमेंट (Necessary Precautions and Lifestyle Adjustments)
आर्थोपेडिक्स गाइडलाइन के अनुसार एक्सपर्ट टिप्स (Expert Tips as per Orthopedics Guidelines)
हिप रिप्लेसमेंट सर्जरी को लेकर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs about Hip Replacement Surgery)
हिप रिप्लेसमेंट सर्जरी एक आर्थोपेडिक प्रक्रिया है, जिसमें खराब या घिसे हुए हिप जॉइंट (Hip Joint) को कृत्रिम इम्प्लांट (प्रोस्थेसिस) से बदला जाता है। जब दवा, फिजियोथैरेपी या जीवनशैली में बदलाव के बाद भी मरीज को तेज दर्द, अकड़न या चलने में दिक्कत होती है, तब यह सर्जरी की जाती है।
यह सर्जरी अक्सर ऑस्टियोआर्थराइटिस के कारण होती है, जिसमें उम्र के साथ कार्टिलेज घिस जाता है और हड्डियाँ आपस में रगड़ती हैं, जिससे दर्द होता है।
रुमेटॉइड आर्थराइटिस (Rheumatoid Arthritis) में इम्यून सिस्टम की गड़बड़ी से हड्डियों और कार्टिलेज को नुकसान होता है।
अवस्कुलर नेक्रोसिस में हिप जॉइंट को खून की सप्लाई रुकने से हड्डी कमजोर होकर ढहने लगती है।
एक्सीडेंट, फ्रैक्चर, या जन्मजात समस्याओं के कारण भी हिप जॉइंट डैमेज हो सकता है, जिसमें रिप्लेसमेंट जरूरी होता है।
भारत में हर साल 1 लाख से ज्यादा हिप रिप्लेसमेंट सर्जरी (Hip Replacement Surgery) होती हैं। यह संख्या लगातार बढ़ रही है — इसके पीछे वजह हैं लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियाँ, बुजुर्गों की संख्या में बढ़ोतरी, सड़क हादसे और बेहतर सर्जिकल सुविधाएं।

नोएडा में हिप रिप्लेसमेंट सर्जरी की लागत (Hip Replacement Surgery Cost in Noida) कई बातों पर निर्भर करती है। लागत को प्रभावित करने वाले फैक्टर्स निम्नलिखित हैं:
सेरैमिक, मेटल, हाई-फ्लेक्स, हाई-ड्यूराबिलिटी इम्प्लांट की कीमत अलग-अलग होती है। सेरैमिक इम्प्लांट महंगे होते हैं। मगर यह टिकाऊ होते हैं। भारतीय और इम्पोर्टेड इम्प्लांट के बीच भी लागत में बड़ा अंतर होता है।
सर्जन और एनेस्थीसिया (Anesthesia) टीम की फीस भी लागत को प्रभावित करती है। इसी तरह प्री-ऑपरेटिव जांचें यानी ब्लड टेस्ट, एमआरआई, एक्स-रे जांच से लागत बढ़ती है। दवाइयां, फिजियोथैरेपी, हॉस्पिटल में रहने की अवधि भी कुल खर्च को प्रभावित करते हैं।
कई स्वास्थ्य बीमा पॉलिसियां (Insurance Policies) हिप रिप्लेसमेंट को कवर करती हैं जिससे खर्च कम होता है। सरकारी योजनाएं जैसे सीजीएचएस, आयुष्मान भारत, राज्य की स्वास्थ्य बीमा योजनाएं के तहत योग्य मरीज को मुफ्त या काफी कम लागत में इलाज मिलता है। वहीं कुछ पब्लिक सेक्टर और कॉरपोरेट कंपनियां भी कर्मचारियों को यह कवर देती हैं।
इस प्रक्रिया के प्रकार, अस्पताल की सुविधाओं और डॉक्टर की विशेषज्ञता पर निर्भर करती है। सरकारी अस्पताल में 1–2 लाख के आसपास होता है। जबकि निजी मल्टी-स्पेशलिटी या कॉर्पोरेट अस्पताल में 2.5–6 लाख होता है। सटीक जानकारी के लिए किसी विश्वसनीय आर्थोपेडिक्स या अस्पताल से संपर्क करना उचित होगा।
हिप रिप्लेसमेंट एक नियोजित सर्जरी होती है। जो मरीज की पूरी जांच और तैयारी के बाद की जाती है।
इसमें मरीज का पूरा मेडिकल इतिहास और फिजिकल एग्जामिनेशन करते हैं। जरूरी जांचों में ब्लड टेस्ट, यूरिन टेस्ट, एक्स-रे या एमआरआई और ईसीजी शामिल हैं। अगर जरूरत हो तो कार्डियोलॉजिस्ट या फिजिशियन से फिटनेस क्लीयरेंस लेते हैं। मरीज को दवाइयों की जानकारी देना भी जरूरी है। खासकर अगर वह ब्लड थिनर या डायबिटीज की दवाइयां ले रहे हैं। इसमें डॉक्टर सर्जरी, रिकवरी और सावधानियों के बारे में बताते हैं। सर्जरी से पहले फिजियोथेरेपिस्ट से भी सलाह ली जाती है। जिससे ऑपरेशन के बाद की एक्सरसाइज पहले से सीखी जा सके।
हिप रिप्लेसमेंट सर्जरी 1.5 से 3 घंटे तक चलती है। समय मरीज की मेडिकल कंडीशन, सर्जन की तकनीक और इम्प्लांट के प्रकार पर निर्भर करता है। अगर दोनों हिप एक साथ बदले जाएं तो समय दोगुना लगता है।
हिप इम्प्लांट मुख्यत दो हिस्सों का बना होता है। पहला बॉल (फीमरल हेड) और दूसरा सॉकेट (जो पेल्विक बोन) का हिस्सा होता है। इम्प्लांट के मटेरियल में मेटल-ऑन-मेटल, सेरैमिक-ऑन-सेरैमिक, मेटल-ऑन-पॉलीथीलीन और सेरैमिक-ऑन-पॉलीथीलीन जैसे विकल्प होते हैं। इसमें मरीज की उम्र, लाइफस्टाइल और डॉक्टर की सलाह के अनुसार इम्प्लांट का चयन करते हैं। हालंकि अब हाई-फ्लेक्स और हाई-ड्यूराबिलिटी इम्प्लांट भी लोकप्रिय हैं, जो ज्यादा समय तक टिकते हैं।
सर्जरी के लिए आम तौर पर दो विकल्प होते हैं। पहला जनरल एनेस्थीसिया इसमें मरीज पूरी तरह बेहोश रहता है जबकि रीजनल एनेस्थीसिया (स्पाइनल या एपिड्यूरल) में शरीर के निचले हिस्से को सुन्न किया जाता है मरीज हल्की नींद में रहता है। दोनों का विकल्प डॉक्टर मरीज की उम्र, स्वास्थ्य स्थिति और सहायक बीमारियों के आधार पर चुनते हैं।
हिप रिप्लेसमेंट के बाद रिकवरी का मतलब सिर्फ नया जॉइंट लगना नहीं है, बल्कि मांसपेशियों को फिर से मजबूत बनाना और दोबारा चलने की आदत डालना भी उतना ही जरूरी हिस्सा है।
अस्पताल में मरीज को 4–7 दिन तक रहना पड़ता है। कुछ मामलों में कम उम्र, कम जटिलता 2–3 दिन तक हो सकती है। हॉस्पिटल में सर्जिकल टीम, फिजियोथैरेपिस्ट और नर्सिंग स्टाफ रिकवरी की शुरुआती देखभाल करते हैं।
फिजियोथैरेपी की शुरुआत सर्जरी के अगले दिन होती है। शुरुआत में खड़े होना, कुर्सी पर बैठना, वॉकर के सहारे कुछ कदम चलना बताया जाता है। धीरे-धीरे बैलेंस, ताकत और फ्लेक्सिबिलिटी कराई जाती हैं। फिजियोथैरेपी और नियमित चलने से रिकवरी जल्दी होती है।
वॉकर या क्रच की मदद से चलना चाहिए, कुछ सीढ़ियां चढ़ना व उतरना चाहिए, पैरों की हल्की एक्सरसाइज से सूजन कम होती है, ब्लड सर्कुलेशन बनता है।
घर में वॉकर से चलना चाहिए, फिजियोथैरेपी से जॉइंट की मूवमेंट बेहतर होती है, शुरूआत में ड्राइविंग, झुककर वजन उठाना या ज्यादा खड़े वहीं रहना चाहिए।
ज्यादातर लोग हिप रिप्लेसमेंट के बाद बिना सहारे के चल पाते हैं। इसके बावजूद, साइक्लिंग, स्विमिंग और लंबी वॉक जैसी हल्की एक्सरसाइज़ ज़रूरी होती है। वहीं, रनिंग और जंपिंग जैसे हाई-इम्पैक्ट खेलों से बचना चाहिए।
शुरुआती हफ्तों में दर्द और सूजन के लिए पेन किलर और एंटी-इंफ्लेमेटरी दवा डॉक्टर की सलाह पर लेवी चाहिए। ब्लड क्लॉट रोकने के लिए ब्लड थिनर या इंजेक्शन देते हैं। बावजूद डॉक्टर की सलाह पर दवाओं की खुराक में बदलाव करें।
हिप रिप्लेसमेंट सर्जरी की सफलता काफी हद तक आपकी जीवनशैली पर निर्भर करती है। इसलिए ज़रूरी है कि लोग अपनी दिनचर्या और आदतों में सही बदलाव करें।
बहुत ज्यादा झुककर काम करना या जमीन पर बैठने से बचें, बहुत लो सीट या बिना आर्मरेस्ट वाली कुर्सियों पर बैठने से बचें, सीढ़ियों पर जल्दी चढ़ने या उतरने से बचना चाहिए, पद्मासन जैसी मुद्रा में बैठना, दौड़ना, जंपिंग, फुटबॉल-बास्केटबॉल जैसे हाई-इम्पैक्ट स्पोर्ट्स खेल से बचना चाहिए। भारी वजन उठाना या अचानक मुड़ना और गीले फर्श या ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर फिसलने से बचना चाहिए।
जितना हो सके हिप को 90 डिग्री से ज्यादा न मोड़ें। अचानक झटके या ट्विस्ट नहीं करें। इससे सर्जरी के बाद परेशानी हो सकती है।
ऑपरेशन साइट को साफ और सूखा रखना चाहिए, ड्रेसिंग निर्देशों का पालन करना चाहिए, शुरुआती हफ्तों में भीड़भाड़ वाली जगह पर जाने से बचना चाहिए, दांतों का इलाज व अन्य सर्जरी से पहले डॉक्टर को बताना चाहिए। कई बार एंटीबायोटिक प्रोफिलैक्सिस की जरूरत पड़ती है। इम्यून सिस्टम को मजबूत रखने के लिए पर्याप्त नींद, पौष्टिक आहार और पर्याप्त पानी पीना जरूरी है।
कैल्शियम, प्रोटीन और विटामिन डी से भरपूर भोजन हड्डियों और मांसपेशियों को मजबूत करता है। जंक फूड, बहुत ज्यादा मीठा और प्रोसेस्ड फूड खाने से बचना चाहिए, वजन पर नियंत्रण रखना चाहिए। कई बार ज्यादा वजन इम्प्लांट पर दबाव डालता है, इसलिए पर्याप्त पानी पिएं, कब्ज से बचें।
सर्जरी के 6 हफ्ते बाद, फिर 3 महीने, 6 महीने और हर साल फॉलोअप जरूरी है। एक्स-रे और जांच से इम्प्लांट की पोजिशन और हड्डी की निगरानी जरूरी है इसलिए किसी भी दर्द, सूजन या चाल में बदलाव महसूस होने पर डॉक्टर को बताएं।
हिप रिप्लेसमेंट की सफलता सही प्लानिंग, सर्जन की कुशलता और देखभाल पर निर्भर होती है।
अगर आप नोएडा में हैं तो ग्रेटर नोएडा में सर्वश्रेष्ठ हड्डी रोग विशेषज्ञ को दिखाने के लिए सही चुनाव भी आवश्यक है इसलिए सही हिप रिप्लेसमेंट करने वाला ऑर्थोपेडिक सर्जन चुनें। इसके लिए एनएबीएच जैसी मान्यता प्राप्त मल्टी-स्पेशियलिटी या सुपर-स्पेशियलिटी अस्पताल बेहतर हैं। मरीज के रिव्यू, इन्फेक्शन रेट और सर्जरी की सफलता दर देखनी चाहिए। जरूरत पड़े तो मेट्रो सिटी या नामचीन सेंटर पर भी विचार करें, फॉलोअप में आसानी के बारे में भी सोचें।
प्री-हैब ऑपरेशन से पहले कुछ हफ्तों तक हल्की फिजियोथैरेपी की सलाह दी जाती है जिससे मांसपेशियां मजबूत हों। सर्जरी के तुरंत बाद से फिजियोथेरेपिस्ट की सलाह पर व्यायाम शुरू करें। हर स्टेज पर एक्सरसाइज की तकनीक, सही मूवमेंट और वॉकर का उपयोग करना चाहिए लेकिन बिना सलाह के नए व्यायाम या स्ट्रेच नहीं करें।
ज्यादातर ब्रांडेड इम्प्लांट के साथ वारंटी कार्ड, बैच नंबर और सर्टिफिकेट मिलता है। इसे अस्पताल से जरूर लेना चाहिए। इससे भविष्य में इम्प्लांट बदलने या किसी दावे में सहूलियत होती है। इम्प्लांट रजिस्ट्रेशन से यह सुनिश्चित करें कि इसकी प्रामाणिक, मान्यता बेहतर है।
रोजाना हल्की वॉक, स्विमिंग, साइकलिंग जैसी लो-इम्पैक्ट ऐक्टिविटी करें। इससे जॉइंट स्वस्थ रहता है। मांसपेशियां मजबूत रहती हैं। बहुत भारी वजन उठाने, दौड़ने, जंपिंग या रग्बी-फुटबॉल से बचें। वजन नियंत्रित रखें। ज्यादा वजन इम्प्लांट पर अतिरिक्त दबाव डालता है साथ ही घर में फर्श पर फिसलन, ऊंची चौखट, लो सीट्स जैसी चीजों को सुधारें, जिससे गिरने की आशंका कम हो। फॉलोअप, नियमित एक्सरे और डॉक्टर की सलाह पर कराएं।
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हिप रिप्लेसमेंट दर्द को कम करके, चाल को बेहतर बनाकर और आत्मविश्वास लौटाकर जीवन की गुणवत्ता में बड़ा बदलाव लाती है। सही जानकारी, प्रामाणिक सर्जन और सेंटर का चुनाव, सावधानियां, फिजियोथैरेपी और हेल्दी लाइफस्टाइल सर्जरी को सफल और टिकाऊ बनाते हैं। इसलिए क्टर और फिजियोथेरेपिस्ट की सलाह मानकर, नियमित फॉलोअप कराएं। लोग सुरक्षित दिनचर्या अपनाकर आप हिप रिप्लेसमेंट के बाद भी नॉर्मल, दर्द-मुक्त और खुशहाल जीवन जी सकते हैं।
प्रश्न 1: हिप रिप्लेसमेंट की लागत कितनी आती है?
उत्तर : सरकारी अस्पताल में 1–2 लाख के आसपास होता है। जबकि निजी मल्टी-स्पेशलिटी या कॉर्पोरेट अस्पताल में 2.5–6 लाख होता है।
प्रश्न 2: क्या हेल्थ इंश्योरेंस या सरकारी योजना से मदद मिलती है?
उत्तर: सीजीएचएस, ईसीएचएस, आयुष्मान भारत जैसी सरकारी योजनाओं में कवर मिलता है। वहीं निजी हेल्थ इंश्योरेंस में भी सर्जरी, इम्प्लांट और हॉस्पिटल खर्च का कवर करता है।
प्रश्न 3: सर्जरी के बाद हॉस्पिटल में कितने दिन रहना पड़ता है?
उत्तर: आमतौर पर 4–7 दिन का हॉस्पिटल स्टे होता है। कुछ मामलों में कम या ज्यादा हो सकता है।
प्रश्न 4: दोबारा चलना-फिरना कब तक संभव होता है?
उत्तर: सर्जरी के अगले दिन से फिजियोथेरेपी के जरिए वॉकिंग कराई जाती है। 3–6 महीने में बिना सहारे चलने लगते हैं। हल्की एक्टिविटी भी संभव होती है।
प्रश्न 5: किन सावधानियों का खास ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर: ज्यादा झुकना। जमीन पर बैठना। लो सीट, क्रॉस-लेग बैठना। दौड़ना-जंपिंग। भारी वजन उठाने से बचना चाहिए।
प्रश्न 6: इम्प्लांट की उम्र कितनी होती है?
उत्तर: आधुनिक इम्प्लांट औसतन 15–20 साल या उससे ज्यादा चलते हैं। बशर्ते वजन नियंत्रित रखें और सावधानी बरतें।